राब्ता

राब्ता है कुछ तो

वरना क्यों खाली पन्नो पर

शब्द उकेरा करती है

मेरी कलम
देख लेती है चेहरा तेरा

इस कोरे कागज मे
फिर ज़ज़्बात निकलते है

गिरते सम्भलते 

स्याही संग उतर आते है
ढल जाते है किसी कविता मे

या बन जाते है कोई कहानी
जब तुम इन्हे पढ़ती हो

यही शब्द आंसू बन जाते है
तुम कहती हो, राब्ता नही है!
फिर क्यों ये आंसू रास्ता ढूंढ लेते है

इन आँखों से मेरे दिल तक का..